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JHANSI NEWS: रानी लक्ष्मी बाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झाँसी के निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ. सुशील कुमार सिंह ने किसानों को जौ की खेती के प्रति जागरूक करते हुए बताया कि जौ रबी मौसम की एक महत्वपूर्ण खाद्यान्न फसल है, जिसकी खेती उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक क्षेत्रफल पर की जाती है। इसकी विशेषता यह है कि जौ की खेती कम उपजाऊ एवं क्षारीय भूमि में भी सफलतापूर्वक की जा सकती है। डॉ. सिंह ने बताया कि जौ का उपयोग मुख्य रूप से बेकरी उत्पाद, माल्ट तथा सर्राफ उद्योगों में किया जाता है। इसकी खेती के लिए बलुई दोमट एवं दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है। जौ की बुवाई अक्टूबर से नवंबर माह तक की जा सकती है। प्रति हैक्टेयर 60 से 80 किलोग्राम बीज की मात्रा पर्याप्त होती है। उन्होंने बताया कि बुवाई के समय किसान भाई सिंचित एवं असिंचित दशा के अनुसार अनुशंसित उर्वरकों का प्रयोग करें तथा बुवाई के 20 से 30 दिन बाद हल्की सिंचाई अवश्य करें। जौ की प्रमुख प्रजातियों में पंत जौ 1106, आरडी 2786, आरडी 2794, आरडी 8899, आरडी 2907, डीबीडब्ल्यू आरबी 137, आरडी 73, आरडी 91 उल्लेखनीय हैं। माल्ट उद्योग हेतु डीबीडब्ल्यू 52 प्रजाति उपयुक्त है, जबकि क्षारीय भूमि के लिए आरडी 2552 एवं डीएल 88 की अनुशंसा की जाती है।डॉ. सिंह ने कहा कि किसान भाई अपनी भूमि की प्रकृति के अनुसार उपयुक्त प्रजाति का चयन करें और विश्वविद्यालय द्वारा बताई गई उन्नत तकनीकों को अपनाकर जौ की खेती करें। उचित प्रबंधन के साथ किसान प्रति हैक्टेयर 40 से 45 क्विंटल उपज प्राप्त कर सकते हैं। जौ की फसल सामान्यतः 115 से 120 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। उन्नत तकनीक अपनाएं, अधिक उत्पादन पाएं – जौ बनेगा लाभकारी विकल्प!