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एकल पीठ के निर्णय के खिलाफ दायर विशेष अपीलें स्वीकार, 35 याचियों को झटका, याचिकाएं खारिज
कोर्ट ने कहा वित्तीय सहायता प्राप्त करना मूल अधिकार नहीं
PRAYAGRAJ NEWS: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि राज्य सरकार निजी प्राथमिक विद्यालयों को अनुदान देने के लिए बाध्य नहीं है भले ही वे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों को शिक्षा प्रदान करते हों। अनुदान प्राप्त करना किसी संस्था का मूल अधिकार नहीं है। कोर्ट ने सरकार द्वारा विद्यालय को 2024मे अनुदान देने के फैसले पर हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया किन्तु कहा कि अध्यापकों को वेतन भुगतान का आदेश नही दिया जा सकता।यह सरकार पर है कि वह अध्यापकों की योग्यता नियमानुसार नियुक्ति पाने की दशा में उचित निर्णय ले। यह फैसला न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति अरुण कुमार की खंडपीठ ने राज्य सरकार की विशेष अपील पर दिया है। राज्य सरकार का तर्क था कि उसने अपना वैधानिक दायित्व पूरा किया है और हर किलोमीटर पर एक प्राथमिक विद्यालय और प्रत्येक तीन किलोमीटर पर एक जूनियर हाई स्कूल स्थापित किया है। कोर्ट ने कहा कि निजी विद्यालयों को अनुदान देने का निर्णय राज्य सरकार का नीतिगत मामला है और इसमें हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। खंडपीठ ने राज्य सरकार व तीन अन्य की उन विशेष अपीलों को स्वीकार कर लिया है जिसमें एकलपीठ के दिसंबर 2022 के आदेश को चुनौती दी गई थी। इससे 35 याची लाभान्वित हए थे। उन्हें वेतन देने का आदेश दिया गया था।रमेश कुमार व 13 अन्य, श्री शिवमंगल चौधरी प्राइमरी विद्यालय, किरण यादव व तीन अन्य, छोटेलाल यादव व चार अन्य तथा घनश्याम व 10 अन्य के खिलाफ सरकार की तरफ से विशेष अपील दायर की गई थीं। विपक्षी की याचिकाओं में एकल पीठ ने सरकार को आगे निर्देश दिया कि वे उचित आदेश पारित करके याचिकाकर्ता संस्थान के शैक्षणिक और गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों को वेतन भुगतान के लिए उचित आदेश पारित कर अनुदान को मंजूरी दे और जारी करें। विशेष अपीलें प्रमुख सचिव, समाज कल्याण विभाग,और अन्य के माध्यम से दायर की गई। सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता ने कहा कि याचिकाएं सुनवाई योग्य नहीं थीं। समाज कल्याण विभाग द्वारा, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति वर्ग के बच्चों को शिक्षा देने के लिए प्रोत्साहन के रूप में, निजी प्रबंधन द्वारा चलाए जा रहे प्राइमरी स्कूलों को आवर्ती अनुदान प्रदान करने की पिछली नीति पांच अक्टूबर 2006 को वापस ले ली गई थी, इसलिए याचीगण का दावा पोषणीय नहीं है। खंडपीठ ने कहा, राज्य सरकार ने स्कूलों को नियमित ग्रांट देने का कोई आश्वासन नहीं दिया था। शिक्षकों की सैलरी और दूसरे खर्च मैनेजमेंट को अपने फंड से पूरे करने थे। मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने की राज्य की जिम्मेदारी, जिसे अब मौलिक अधिकार बना दिया गया है, उसे ऐसे स्कूलों के जरिए लागू नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा, महामना मालवीय अनुसूचित जाति प्राथमिक पाठशाला, जाकरीया, रसरा, बलिया को अनुदान देने का फैसला सरकार का है और इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता लेकिन अन्य शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों को वेतन देने के लिए कोई निर्देश नहीं दिया जा सकता है, क्योंकि उनके नियुक्ति और योग्यता के बारे में कोई जानकारी नहीं है। सरकार केवल उन शिक्षकों और कर्मचारियों को वेतन दें, जो नियुक्ति के लिए आवश्यक योग्यता और प्रक्रिया का पालन करते हुए नियुक्त किए गए हैं।