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MIRZAPUR NEWS: (अमरेश चन्द्र पाण्डेय) जनपद के शहर कोतवाली में तैनात थानाध्यक्ष दयाशंकर ओझा के अपने व्यक्तिगत विचार है कि समाज में,मनुष्य का सुखी जीवन असुरक्षित है तो व्यक्ति आतंकित रहता है। उनके अनुसार, मनुष्य की यह एक स्वाभाविक वृति है कि चाहे उसे भरपेट भोजन न मिले, रहने की समुचित व्यवस्था न हो तथा अन्य सामाजिक सुविधाएं कम उपलब्ध हो तो भी उसे पुलिस की ओर से सुरक्षा की गारंटी मिले तो वह कथित कष्टों के होते हुए भी अपने को स्वतंत्र और सुखमय अनुभव करता है तथा उसे खाली पेट की तपन महसूस नहीं होती । चित्रकूट धाम के निवासी दयाशंकर ओझा में भक्ति और दया का भाव कूट-कूट कर भरा है। अपने कर्तव्य निर्वहन में भक्ति दया और सेवा परमो ‘धर्म’ भाव को नियोजित कर कार्य करते है । यही कारण है उनसे आज तक कोई उनसे अप्रसन्न हुआ ही नहीं। शहर कोतवाली में पदभार ग्रहण किए अभी कुछ ही दिन हुए है,लोग उनके मुरीद बनते जा रहे है। लोगों का कहना है कि वे उनके मृद व्यवहार व शिष्ट वाणी के कायल हो गए है। लोगों का कहना है कि उपेक्षा एवं तिरस्कार, असभ्यता व अशोभनीय आचरण उनके व्यक्तित्व में कहीं दिखाई नहीं पड़ता । थाना एवं थानेदार जहां भय के पर्याय माने जाते है। वहीं निर्भय होकर कोई भी व्यक्ति दयाशंकर ओझा से अपनी बातों को कह सकता है। फरियादियों को सम्मानपूर्वक बैठाकर उसकी पीड़ा को सुनना व उसका निराकरण करना उनकी कार्यशैली में शुमार है। कर्तव्य के प्रति चिंता और दूरदृष्टी रखने वाले दयाशंकर ओझा कभी कोई गलत समझौता और सौदा नहीं करना जानते। ऐसे व्यक्तित्व के लोग पुलिस महकमे में अपेक्षा कृत कम ही दिखाई पड़ते है। यदि सत्य कहा जाए तो ब्रिटिश हुकूमत के बाद खाकी वर्दी पर लगे बिल्ले की इबारत में तो परिवर्तन हुआ किन्तु वर्दी के अंदर छिपी शख्सियत में अपेक्षाकृत पूरा परिवर्तन नहीं हो पाया । कारण चाहे जो भी हो लेकिन दयाशंकर ओझा इसके अपवाद है और वे पुलिस कम ‘हमदर्द’ के रूप में ज्यादा दिखाई पड़ते है।