सरकारी नियमो को रौंदकर फर्जी नौकरी उजागर डीआईओएस बने धृतराष्ट्र

नियमो की हत्या कर मृतक कोटे मे हथियाई गयी नौकरी का खुलासा के बाद भी डीआईओएस मौन संदेह के धेरे मे

नियम तोड़े, कोर्ट के आदेश कुचले, फिर भी कार्रवाई शून्य

KUSHINAGAR NEWS:  सरकारी नियमों को रौंदकर और व्यवस्था की आंखों में धूल झोंककर फर्जी तरीके से नौकरी हथियाने वाले महात्मा गांधी इंटर कॉलेज, सखवनिया के सहायक लिपिक अविनाश गुप्ता का मामला उजागर होने के बावजूद जिला विद्यालय निरीक्षक श्रवण कुमार गुप्त द्वारा अब तक कोई कार्रवाई न किया जाना गंभीर संदेह के घेरे में है। यह चुप्पी अब केवल लापरवाही नहीं, बल्कि फर्जीवाड़े को संरक्षण देने जैसी प्रतीत हो रही है। बतादे कि प्रकरण कसया विकासखंड अंतर्गत स्थित महात्मा गांधी इंटर कॉलेज से जुड़ा है, जहां अविनाश गुप्ता ने अपने पिता के मृत्यु के पश्चात मृतक आश्रित कोटे के तहत नौकरी हासिल की है जबकि तथ्य यह है कि उसकी मां पहले से ही सरकारी सेवा में कार्यरत थीं। इसके बावजूद अविनाश गुप्ता ने इस महत्वपूर्ण तथ्य को छिपाकर कागजातों में हेराफेरी करके अवैध रूप से सरकारी नौकरी हथिया लिया। नियम स्पष्ट हैं परिवार का कोई भी सदस्य अगर सरकारी नौकरी में है तो किसी भी दशा मे मृतक आश्रित कोटे में नौकरी नही मिल सकती है यह नियुक्ति पूरी तरह अवैध मानी जाती है। मतलब यह कि अविनाश गुप्ता की नियुक्ति पूरी तरह से अवैध है। ऐसे मे यह  मामला सिर्फ विभागीय नियमों के उल्लंघन का नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दिशा-निर्देशों की खुली अवहेलना का भी है।
साहब! न्यायालय का आदेश नजीर है नजारा
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट गाइडलाइन पर नजर दौडायें तो वर्ष 1994 मे
सुप्रीम कोर्ट ने उमेश कुमार नागपाल बनाम हरियाणा सरकार के मामले में साफ कहा है कि “मृतक आश्रित नियुक्ति कोई अधिकार नहीं, बल्कि केवल तत्काल आर्थिक संकट से उबरने के लिए दी जाने वाली असाधारण राहत है। यदि परिवार का कोई सदस्य पहले से रोजगार में है, तो ऐसी दशा में अनुकंपा नियुक्ति नहीं दी जा सकती।”
इसी तरह  राज्य सरकार हिमाचल प्रदेश बनाम शशि कुमार के मामले 2019 में सर्वोच्च न्यायालय ने दो टूक कहा है कि “करुणा नियुक्ति का उद्देश्य सरकारी नौकरी बांटना नहीं, बल्कि मृतक कर्मचारी के परिवार को भुखमरी से बचाना है। पात्रता के नियमों से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।” मृतक आश्रित का लाभ उस समय दिया जा सकता है जब परिवार में कोई सदस्य सरकारी नौकरी मे न हो। इसी कडी मे हाई कोर्ट के   रुख पर गौर करे तो इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मृतक आश्रित के कई मामलों में स्पष्ट कर चुका है कि मृतक आश्रित नियुक्ति तभी वैध है जब परिवार में कोई भी सदस्य सरकारी या स्थायी रोजगार में न हो, तथ्यों को छिपाकर ली गई नियुक्ति शून्य मानी जाएगी ऐसी नियुक्ति तत्काल प्रभाव में रद्द कर   वेतन की वसूली की जा सकती है। एक अन्य प्रकरण मे हाईकोर्ट प्रयागराज ने कहा है “माँ के सरकारी सेवा में रहने के बावजूद तथ्य छिपाकर पिता के आश्रित में नियुक्ति पाना पूरी तरह गलत व अवैध है।”इन स्पष्ट न्यायिक आदेशो के बावजूद कुशीनगर में नियमों और कोर्ट के आदेशों को ताक पर रखकर सहायक लिपिक अविनाश गुप्ता की नियुक्ति होना और फिर खुलासे के बाद भी डीआईओएस द्वारा अब तक  कोई कार्रवाई न करना अपने आप मे कई गंभीर सवाल खड़ा करता है। सबसे गंभीर पहलू यह है कि मीडिया द्वारा गांधी इंटर कालेज सखवनिया मे तैनात सहायक लिपिक अविनाश गुप्ता के पूरे प्रकरण की खुलासे के बावजूद न तो विभागीय जांच बैठाई गई, न फर्जी नियुक्ति निरस्त की गई और न ही जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब तलब किया गया। यह चुप्पी अब मौन संरक्षण की श्रेणी में गिनी जा रही है।
विधि विशेषज्ञो की राय
कानूनी जानकारों की मानें तो यह नियुक्ति पूरी तरह से नियम विरुद्ध व अवैध है, ऐसी दशा मे सहायक लिपिक अविनाश गुप्ता की नियुक्ति तत्काल रद्द कर अब तक दिये गये वेतन की वसूली की जानी चाहिए। विशेषज्ञो ने यह भी कहा कि इस फर्जीवाड़े में शामिल कर्मचारी व अधिकारियों पर एफआईआर और विभागीय कार्रवाई भी अनिवार्य रूप से होनी चाहिए। ऐसे मे विभाग व शासन स्तर से कार्रवाई न होना इस ओर इशारा करता है कि कुशीनगर में न केवल विभागीय नियमों की, बल्कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के आदेशों की भी खुलेआम धज्जियां उडाई जा रही है। ऐसे में यह प्रकरण सिर्फ कर्मचारी की फर्जी व अवैध नियुक्ति का नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा विभाग की वैधानिक और नैतिकता के साख पर उठ रहे सवाल है?

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