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शीर्षक – गृहलक्ष्मी
गृहलक्ष्मी को पूर्ण परिभाषित करना नहीं है इतना भी सरल,
उसका पद, महत्व और सहभागिता जीवन में सबके है अविरल,
माता, बहन, पत्नी, बेटी और बहू हर रंग रूप उसमें हैं समाया,
वसुंधरा पर वो ईश्वर की भेजी हुई एक सकारात्मक प्रति छाया ।
सत्य संकल्प लेकर करती है वो अपरिचित सृष्टि में पदार्पण,
मुस्कुराहटों में गम छिपा करती जीवन के प्रतिपल को अर्पण,
निर्मल निश्छल मन उसका सहमी-सहमी वो हृदय की भावुक,
समय चक्र के फेरे में हो जाती परिपक्क कुसुमित कली नाजुक ।
पीहर और ससुराल पक्ष से जोड़े रखें वो प्रेम का अनूठा सम्बन्ध,
स्नेह उसका समरस पारदर्शी भावों की बिखरी भीनी सी सुगंध,
निभाती निःसंकोच तटस्थ वो आखिरी श्र्वास स्पंदन तक वादा,
समझने वाला उसे हो कोई ढूंढती जीवन पर्यन्त ऐसा मन वो सादा ।
किस्मत की टेढ़ी-मेढी़ लकीरों से शिकायत कभी भी न करती,
परिवार में नव चेतना “आनंद” सृजन नव रस वो नित ही भरती,
घर को स्वर्ग बनाती खन-खन बजती उसकी रंग बिरंगी चूड़ियॉं,
त्योहारों की रौनक उससे सजती इन्द्रधनुषी ख्वाबों की दुनिया ।
ममत्व, त्याग, तप, साहस और सरस समर्पण उसका हैं बेजोड़,
शक्ति वो नव बीज को चैतन्य कर लक्ष्य की ओर देती हैं मोड़,
प्रेम माला में एक सूत्र में पिरोती वो परिवार के नगीने चमकीले,
उसने समझे और करें ताल-मेल स्वर सप्तक सुर, लय सुरीले ।
संघर्षों को नजरंदाज कर हम मृदुभाषिणी को कर देते हैं मूक,
मान गृहलक्ष्मी का प्रथम करना होगा मगर कर बैठते हैं हम चूक,
लक्ष्मी की चाहत हैं रखते और जाने-अंजाने में कर देते बड़ी भूल,
गृहलक्ष्मी को आदर न दे, महत्वहीन बता बोते हैं जीवन में शूल ।
लेखिका- मोनिका डागा “आनंद” ,
चेन्नई, तमिलनाडु