मां के पेट से 18 पारा के हाफिज़ बने गौसे-ए-आज़म, धूमधाम से मनाया गया ग्यारहवीं शरीफ

MIRZAPUR NEWS: (शाहिद वारसी) शनिवार को जिलेभर में मुस्लिम समुदाय के लोगों ने बड़ी अकीदत और शान-ओ-शौकत के साथ ग्यारहवीं शरीफ यानी ईद-ए-गौसिया का त्यौहार मनाया गया।इस मौके पर जगह-जगह मिलाद शरीफ का आयोजन किया गया और हज़रत गौसे-ए-आज़म शेख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह की याद में नज़र-नियाज़ पेश की गई। मुस्लिम समुदाय के लोगों ने अपने-अपने घरों और मस्जिदों में फातिहा पढ़ी, दुआएं मांगी और गरीबों में खाना तक़सीम किया। जगह-जगह महफिल-ए-मिलाद का एहतमाम किया गया। जिसमें नात-ओ-मुनाजात की सुरीली आवाज़ों से माहौल रूहानी हो उठा। हज़रत गौसे-ए-आज़म शेख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह का जन्म करीब 1077 ईस्वी में ईरान के गिलान प्रांत में हुआ था। आप सूफी सिलसिला कादरिया के संस्थापक माने जाते हैं। आपका मजार शरीफ इराक के बगदाद में स्थित है, जो आज भी दुनिया भर के अकीदतमंदों के लिए मरकज़-ए-अकीदत बना हुआ है। आपके वालिद का नाम अबू सालेह मूसा अल-हसनी और वालिदा का नाम उम्मुल खैर फातिमा था। रिवायतों में आता है कि सरकार हुज़ूर गौसे-ए-आज़म शेख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलैह जब अपनी मां की कोख में थे, उसी दौरान उन्होंने कुरान के 18 पारे याद कर लिए थे। कहा जाता है कि जब मां मुत्तकी और परहेज़गार होती है, तब बेटा अब्दुल क़ादिर जैसा पैदा होता है। हज़रत गौसे-ए-आज़म को सरकार-ए-दस्तगीर और बड़े पीर के नाम से भी जाना जाता है।ग्यारहवीं शरीफ हर साल इस्लामी माह रबी-उस-सानी की 11वीं तारीख को मनाई जाती है। इस मौके पर मिलाद शरीफ, नात-ख़्वानी और दुआओं का सिलसिला दिनभर चलता रहा।

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