आखिरकार.”परिस्थितियों का दास मैं”

अब चाहें धारण कर लूं,भले खुश-लिबास मैं,
पर जिम्मेदारियां के बोझ से, रहता हूं उदास मैं।।
अब और क्या बयां करू,कैसे दिलाऊं विश्वास मैं,
आखिरकार बनकर रह गया हूं, परिस्थितियों का दास मैं।।

अब चाहें आए जितनी बाधाएं, कर रहा हूं प्रयास मैं,
हर गलती से सीख कर, पुनः कर रहा हूं अभ्यास मैं।
सफल हो जाऊंगा एक दिन, लगा कर बैठा हूं आश मैं,
खत्म होंगे मेरे भी बनवास, लौटूंगा एक दिन अपने निवास मैं।।

कहीं चूक रह गई हो परिश्रम में, तो करूं पूजा,अर्चना और उपवास मैं,
क्या छोड़कर दायित्व सब,अब करूं तीर्थ और कल्पवास मैं।
अर्थशास्त्र,भूगोल पढ़-पढ़ कर, खुद बन गया हूं एक इतिहास मैं,
उपहास कर रही है दुनियां, सबको लग रहा है कर रहा हूं बकवास मैं।।

अब और क्या बयां करू, कैसे दिलाऊं विश्वास मैं…..
आखिरकार बनकर रह गया हूं, परिस्थितियों का दास मैं।।

कवि:- ✍️आशीष कुमार सैनी
पुराछात्र-(इलाहाबाद विश्वविद्यालय)
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश,भारत।

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