स्थापना दिवस पर भारतरत्न अटल बिहारी बाजपेयी की स्मृति में समारोह

LUCKNOW NEWS: उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा संस्थान के 49वें स्थापना दिवस के अवसर पर “भारतरत्न अटल बिहारी बाजपेयी” की स्मृति में मंगलवार 30 दिसम्बर, 2025 को एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन हिन्दी भवन के निराला सभागार लखनऊ में पूर्वाह्न 10.30 बजे से किया गया। दीप प्रज्वलन, माँ सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण, पुष्पार्पण के उपरान्त वाणी वंदना डॉ० गीता शुक्ला द्वारा प्रस्तुत की गयी। अतिथि डॉ० विद्या विन्दु सिंह, डॉ० सुधाकर अदीब, डॉ० देवेन्द्र कुमार सिंह एवं विनय श्रीवास्तव का स्वागत उत्तरीय एवं स्मृति चिह्न भेंट कर डॉ० अमिता दुबे, प्रधान सम्पादक, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा किया गया। डॉ० विद्या विन्दु सिंह ने कहा- भारत रत्न अटल बिहारी बाजपेयी का स्वभाव काफी सरल व सौम्य था। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को जानने के लिए उनके ग्रंथों का अध्ययन करने की आवश्यकता है। ठाकुर प्रसाद सिंह का व्यक्तित्व काफी सरल व मिलनसार था। रमाकान्त श्रीवास्तव ने हाइकू साहित्य भी लिखा है। जीवन का संघर्ष हमें यह बताता है कि हमने उससे क्या सीखा। डॉ० सुधाकर अदीब ने कहा- अटल जी श्रेष्ठ कवि, महान राजनेता व साहित्य के अप्रतिम व्यक्तित्व के धनी थे। भारत रत्न अटल बिहारी जी में अद्भुत भाषण कला थी। उनमें विचारों के प्रस्तुतिकरण की अद्भुत क्षमता थी। उनके भाषणों में कभी कडुवाहट नहीं दिखायी पड़ी। “कड़ी दुपहरी में अंधियारा आओ फिर से दिया जलायें” कविताएँ काफी चर्चित रहीं। वे कुशल कवि व राजनीतिज्ञ थे। वे प्रकांड विद्वान, महान राजनीतिज्ञ थे। वे साहित्यिक रुचि के धनी थे। मंचीय कवियों में उनकी गणना महत्वपूर्ण थी। उनकी ‘परिचय’ कविता काफी प्रचलित रही है। “हिन्दू तन मन हिन्द जीवन” जोश पूर्ण कविता सुनकर श्रोता झूम जाते हैं। “उनकी याद करें” कविता राष्ट्रीयता से परिपूर्ण है। “आओ मन की गांठें खोलें” कविता काफी चर्चित रही है। अटल जी का मानना था कि भारत एक भूखण्ड नहीं बल्कि यह एक राष्ट्र पुरुष है। डॉ० देवेन्द्र कुमार सिंह ने कहा- ठाकुर प्रसाद सिंह का जीवन सरल व विराट था। उनके साहित्य में लोक था। उनको गढ़वाली भाषा का भी ज्ञान था। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की साहित्यिक यात्रा काफी लम्बी थी। ठाकुर प्रसाद सिंह का व्यक्तित्व काफी जुझारू था। ठाकुर प्रसाद सिंह के लेखन व भाषा शैली में बनारस परिलक्षित होता है। ठाकुर प्रसाद सिंह ने अपने स्वाभिमान के साथ कभी समझौता नहीं किया। विनय श्रीवास्तव ने कहा रमाकांत श्रीवास्तव सम्पादक व साहित्यानुरागी थे। उनके जीवन के कई पहलू थे। उन्होंने श्रम को अपनी पूजा माना। वे प्रवृत्ति से कवि व साहित्यकार थे। उनकी गणना विशिष्ट सम्पादकों में की जाती है। उन्होंने संपादक की गरिमा व प्रतिष्ठा को कभी गिरने नहीं दिया। उन्होंने उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान से प्रकाशित पत्रिकाओं का सफलतापूर्वक संपादन कार्य किया। उन्होंने अपने कार्यों से उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान में अपनी एक अमिट छाप छोड़ी थी। उनका पूरा जीवन संपादन कार्य व साहित्य रचना में पूर्णतया समर्पित था। इस अवसर पर हजारी प्रसाद द्विवेदी कृत बाणभट्ट की आत्मकथा के अंश का पाठ अर्चना एवं सुशील द्वारा प्रस्तुत किया गया। ठाकुर प्रसाद सिंह, रमाकान्त श्रीवास्वत एवं अटल बिहारी बाजपेयी की कविताओं का पाठ रत्नमाला एवं सुश्री निर्मला कुमारी द्वारा प्रस्तुत किया गया। डॉ० अमिता दुबे, प्रधान सम्पादक, उ०प्र० हिन्दी संस्थान द्वारा कार्यक्रम का संचालन एवं संगोष्ठी में उपस्थित समस्त साहित्यकारों, विद्वत्तजनों एवं मीडिया कर्मियों का आभार व्यक्त किया गया।

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