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काबे की दरार दीवारें हज़रत अली की पैदाइश की है गवाह
MIRZAPUR NEWS: (शाहिद वारसी) इस्लामिक महीने रजब की 13 तारीख को अमीरुल मोमनीन, शेर-ए-ख़ुदा मौला-ए-कायनात हज़रत अली इब्ने अबू तालिब अ.स. की यौम-ए-विलादत कुरैश नगर समेत पूरे शहर में अकीदत और खुशी के साथ मनाई गई। शनिवार को कुरैश नगर, तरकापुर, रामबाग, इमामबाड़ा, हयात नगर और छोटा मिर्ज़ापुर में इमाम चौकों व घरों पर रौशनी की गई। असर और मगरीब के दरमियान लोगों ने अपने घरों में नज़्र-नियाज़ दिलाई, जिसमें बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों तक ने हिस्सा लिया। लोग एक-दूसरे को मौला अली की विलादत मुबारक कहते नज़र आए और नारा-ए-हैदरी या अली के नारे लगाए गए। कुरैश नगर में मौला अली अ.स. के जन्मदिन पर एक विशेष केक भी काटा गया। केक पर मौला अली अ.स. की मशहूर तलवार ज़ुल्फ़िकार बनी हुई थी। केक को देखने के लिए लोगों की भीड़ जुटी रही और कई लोगों ने अपने कैमरे में कैद कर लिया। इस मौके पर नज़्र का एहतमाम हाफ़िज़ आयान वारसी और वारिस पाक के एहरामपोश मुनव्वर बाबा की देखरेख में किया गया। इस्लामिक तारीख़ के अनुसार मौला अली अ.स. का जन्म मक्का मुअज्ज़मा के ख़ाना-ए-काबा में हुआ था। उनकी वालिदा का नाम बीबी फ़ातिमा बिन्ते असद अ.स. और वालिद का नाम हज़रत अबू तालिब अ.स. है। रिवायतों के मुताबिक, बीबी फ़ातिमा बिन्ते असद काबे के पास दुआ कर रही थीं, तभी काबे की दीवार में दरार आ गई और वह अंदर चली गईं और मौला अली अ.स. की विलादत हुई। मौला अली अलैहिस्सलाम पैगम्बर-ए-इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफा सल्ललाहु अलैहि वसल्लम के चचेरे भाई और दामाद थे। उनकी शादी बीबी फ़ातिमा ज़हरा सलाम उल्ला अलैहा से हुई थी। मौला अली अलैहिस्सलाम इंसाफ़, बहादुरी और सच्चाई के लिए जाने जाते हैं। हर साल 13 रजब को मुसलमान उनकी यौम-ए-विलादत बड़े सम्मान और खुशी के साथ मनाते हैं। इस मौके पर शहर में अमन, भाईचारे और तरक्की के लिए दुआएं की गईं। अमीरुल मोमनीन हज़रत मौला अली अ.स. ने इस्लाम की हिफ़ाज़त और सरबुलंदी के लिए पैग़म्बर-ए-इस्लाम हज़रत मोहम्मद ﷺ के साथ लगभग हर बड़ी जंग में हिस्सा लिया। बद्र, उहुद, खंदक, ख़ैबर और हुनैन जैसी अहम जंगों में मौला अली अ.स. की बहादुरी के किस्से आज भी तारीख़ में दर्ज हैं। बाद में अपने ख़िलाफ़त के दौर में भी उन्होंने जमल, सिफ़्फ़ीन और नहरवान जैसी बड़ी जंगों का सामना किया। इस तरह मौला अली अलैहिस्सलाम इस्लाम के उन सबसे बड़े योद्धाओं में गिने जाते हैं, जिन्होंने पूरी ज़िंदगी दीन की हिफ़ाज़त में गुज़ार दी। इस अवसर पर हैदर अली, सैफ, शाहिद वारसी, तबरेज वारसी, अली हुसैन वारसी, जावेद वारसी, कासिम अली, तारिक अनवर, नौशाद वारसी, शहजादे, अमजद, इमरान, तालिब तस्लीम, अशफाक, गुलाम कुरैशी, अहमद, शफीक अन्य लोग मौजूद रहे।